शायद तुम ही होजो चुपके से आते हो ,हर बार जब भी मैंसोचता हूँ कहाँ हूँ मैंधीरे से मेरे कानो में कुछ कह करफ़िर चले जाते होवहां जहाँ शिवाय कल्पना केवास्तविकता में नहीं पहुचं सकता मैंलेकिन कल्पना में ही अपनीबहुत सी अभीप्साओं की पूर्ति करता हूँतुम्हारे हर एक पहलू कोबड़ी नजाकत से देखतां हूँफ़िर भी नही समझ पाटाकी कौन हो तुममुझसे चिर परिचितया अनजानजो भी होबस तेरा रहना , होना ही काफी हैइस अज्ञेय के लिए ...!(प्रशा...